किस करवट बैठेगी पश्चिम बंगाल की लड़ाई? क्या है रणनीति? समझिये आकड़ों की जुबानी

पश्चिम बंगाल की राजनीति पूरी तरह से गरमाई हुई है. बड़े बड़े राजनितिक रैलियों का दौर शुरू हो गया हैं. भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा तथा केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह एक के बाद एक दौरे कर तृणमूल तथा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर हमले कर रहे है. तो तृणमूल कांग्रेस की तरफ से हमले की कमान खुद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने संभाल रखा है.

पश्चिम बंगाल को लेकर के आखिर अमित शाह एवं भारतीय जनता पार्टी की रणनीति एवं पश्चिम बंगाल की जमीनी स्थिति क्या उसको समझने की कोशिश करते हैं डाटा और कुछ ग्राफिक्स के जरिए.

सर्वप्रथम देखते है 2019 एवं 2014 के लोकसभा चुनाव परिणामो को दर्शाते पश्चिम बंगाल के मानचित्र को.

भारतीय जनता पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव में 42 में से 18 सीटें जीतने में सफल रही जबकि ममता बेनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की सीटें घटकर 22 पर आ गयी. कांग्रेस को दो सीटों से संतोष करना पड़ा. जबकि पश्चिम बंगाल पर 34 साल तक शासन करने वाले वामपंथी - सीपीएम को सिट जितना तो दूर किसी सीट पर दुसरे स्थान तक भी पहुंचने में सफल नहीं हो पाए.

भाजपा द्वारा जीती गई सीटें मानचित्र में भगवा रंग से दिखाया गया जबकि तृणमूल कांग्रेस की सीटों को हरा रंग से दिखाया गया है. कांग्रेस की दो सीटों को नीला रंग से दिखाया गया है.

इस मानचित्र में आप देखेंगे की लोकसभा चुनाव 2019 उत्तर बंगाल की सभी सीटें भारतीय जनता पार्टी जितने में सफल रही यानि पूरा उत्तर बंगाल भगवा हो गया. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस को जो पहली सीट मिली वह मध्य बंगाल की मुर्शिदाबाद जिले से.

उत्तर बंगाल के आलावा झारखंड की सीमा से लगे जंगल महल के आदिवासी बहुल जिलों की अधिकतर सीटों को भाजपा ने जीत लिया. इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी हुगली, उत्तर 24 परगना और वर्धमान जिलों में भी जीत दर्ज करने में सफल रही.

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे मजबूत गढ़ राजधानी कोलकाता और उसके आसपास की सीटें तथा दक्षिण बंगाल को बचाने में सफल रही. इसके अलावा बीरभूम का किला भी बचाने में सफल रही है. ध्यान देने वाली बात है कि तृणमूल कांग्रेस अधिकतर उन सीटों पर जीत दर्ज की है जिनमें मुस्लिम वोटरों की संख्या 20%  से अधिक हैं और कुछ बांग्लादेश की सीमा से लगे है.

2019 लोकसभा चुनाव परिणामों की तुलना अगर 2014 चुनाव परिणामों से करने पर स्थिति और स्पष्ट होती है. जहां 2014 में भाजपा की सीटें 2 थी वह 2019 में बढ़कर 18 हो गयी. जबकि तृणमूल कांग्रेस की सीटें 2014 में 34 से घटकर 2019  में 22 पर आ गयी.

2019 लोकसभा चुनाव परिणाम ने पश्चिम बंगाल का पूरा राजनितिक मानचित्र बदल कर के रख दिया. 2019 में भाजपा न सिर्फ 18 लोकसभा सीटें जितने में सफल रही बल्कि विधानसभा की 128 सीटों पर बढ़त हाशिल करने में सफल रही. जबकि तृणमूल कांग्रेस की बढ़त घटकर 158 विधानसभा सीटों पर आ गयी.

बात यदि मत प्रतिशत की करें भारतीय जनता पार्टी को लगभग 40 प्रतिशत तथा तृणमूल कांग्रेस को लगभग 43 प्रतिशत मत प्राप्त हुए. यानि दोनों पार्टियों के बिच सिर्फ 3 प्रतिशत वोटों का अंतर था.  यदि कुल प्राप्त मतों की बात करें तो भारतीय जनता पार्टी को लगभग 2.30 करोड़ मत प्राप्त हुआ जबकि तृणमूल कांग्रेस को लगभग 2.47 करोड़ मत प्राप्त हुए. दोनों पार्टियों के बीच में मतों का अंतर है वह लगभग 17- 18 लाख के आसपास है.

यदि भारतीय जनता पार्टी को पश्चिम बंगाल की सत्ता में आना है तो उसे मतों के इस अंतर को पटना होगा. अब यह अंतर है मिटेगा कैसे और इसके लिए भारतीय जनता पार्टी की रणनीति क्या है? इसके लिए दो और ग्राफिक देखते है. पहला ग्राफिक त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में अलग-अलग पार्टियों के मिले वोट प्रतिशत है. इससे आपको पश्चिम बंगाल की स्थिति को समझना आसान हो जाएगा. 2018 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने सीपीएम की 25 साल की सत्ता को उखाड़ फेंका था.

2013 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को लगभग 1 प्रतिशत वोट प्राप्त हुआ था जबकि कांग्रेस पार्टी को लगभग 36 प्रतिशत  और सीपीएम को लगभग 50 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ था. 2018 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को वोट प्रतिशत 1 प्रतिशत  से बढ़कर के लगभग 44 प्रतिशत हो गया.  सत्तारूढ़ सीपीएम का वोट प्रतिशत 50 से गिरकर 44 पर आ गया. लेकिन कांग्रेस का वोट प्रतिशत 36 से गिरकर 1 पर आ गया.

2018 त्रिपुरा विधानसभा चुनाव परिणामों से दो चीजे स्पष्ट होती है. पहला सीपीएम सत्ता से बाहर जरुर हुई लेकिन उसके वोट में सिर्फ थोड़ी सी गिरावट आई उसका पूर्ण सफाया नहीं हुआ. दूसरा विपक्ष का सारा वोट भारतीय जनता पार्टी को गया. यानि सभी विपक्षी दलों को ख़त्म करके भारतीय जनता पार्टी मुख्य विपक्षी दल बनी और सत्ता विरोधी लगभग सभी वोट भारतीय जनता पार्टी को स्थानांतरित हो गए.

त्रिपुरा की ही तरह पश्चिम बंगाल में भी विपक्ष को ख़त्म करने का पहला काम भारतीय जनता पार्टी 2019 लोकसभा चुनाव में कर चुकी है. भारतीय जनता पार्टी के वोट 2016 में 10 प्रतिशत से बढ़कर 2019 में लगभग 40 प्रतिशत हो गए. जबकि सीपीएम 2016 के लगभग 25 प्रतिशत से गिरकर 2019 में 7 प्रतिशत तथा कांग्रेस 2016 के 12 प्रतिशत से गिरकर 5 प्रतिशत पर आ गयी. दूसरी तरफ तृणमूल कांग्रेस के वोटों में सिर्फ 2 प्रतिशत का गिरावट आया और से 2016 में मिलें लगभग 45 प्रतिशत के मुकाबले 2019 में लगभग 43 प्रतिशत वोट मिलें. यानि 2019 में भारतीय जनता पार्टी को मिले वोट मूल रूप से तृणमूल कांग्रेस विरोधी वोट थे जो पहले भाजपा, कांग्रेस एवं सीपीएम में बटे थे लेकिन 2019 में एकमुश्त भाजपा को चले गये.

अब यदि भाजपा को पश्चिम बंगाल जितना है तो उसे दोनों पार्टियों के बीच के 3 प्रतिशत के मतों के अंतर को पाटना होगा. इसके लिए उसे तृणमूल कांग्रेस से 3 से 4 प्रतिशत मत तोड़कर अपने तरफ करने होंगे. जबकि तृणमूल को यदि सत्ता में बने रहना है तो ममता बनर्जी को अपने वोटों को टूटने से रोकना होगा. यही कारण है दोनों पार्टियों के बीच के तनाव का और पश्चिम बंगाल की गरमाई राजनीति का.

अब भाजपा वह 3 से 4 प्रतिशत वोट प्रदेश के किस क्षेत्र से प्राप्त कर सकती है उसके लिए देखते है दोनों पार्टियों को 2014 एवं 2019 में पश्चिम बंगाल के किस क्षेत्र में कितना वोट मिला था.

दोनों पार्टियों के बीच के मतों के फसलों के ख़त्म करने के लिए जरुरी 3 से 4 प्रतिशत मत भारतीय जनता पार्टी को ममता बनर्जी के मजबूत गढ़ राजधानी कोलकाता तथा उसके आसपास के क्षेत्र, दक्षिण बंगाल और बीरभूम जैसे क्षेत्र से हासिल करना होगा.

इसी रणनीति के भाजपा ने ममता बनर्जी के दाहिने हाथ शुभेंदु अधिकारी को तोड़कर अपने साथ मिलाया है. दक्षिण बंगाल में ममता बेनर्जी के मजबूत किले में सेंधमारी के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपना दाव शुभेंदु अधिकारी से लगाया है. शुभेंदु अधिकारी की जमीन पर बहुत जबरदस्त पकड़ है वह संगठन के आदमी माने जाते है तथा दक्षिण बंगाल के लगभग 40 से 50 सीटों पर उनका सीधा प्रभाव है. वह नंदीग्राम आंदोलन के नायक रहे है. दक्षिण बंगाल के लिए तो भारतीय जनता पार्टी को शुभेंदु अधिकारी के रूप में एक बड़ा नेता मिल गया है लेकिन राजधानी कोलकाता में ममता के गढ़ में सेंधमारी अभी भी चुनौती है. इसीलिए पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा की पश्चिम बंगाल की यात्रा में ममता बनर्जी के विधानसभा क्षेत्र एवं उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के लोकसभा क्षेत्र डायमंड हार्बर में कार्यक्रम हुए थे. अमित शाह ने दक्षिण बंगाल में रैली तथा बीरभूम में रोड शो किया.

पश्चिम बंगाल में राजनितिक हिंसा चरम पर है. ऐसे माहौल में मतदाताओ का एक वर्ग होता है जो आपको तभी वोट देगा जब आप एकमात्र विकल्प दिखाई देंगे और आप जीते हुए दिखाई देंगे. क्योंकि उसे चुनाव बाद के हिंसा का डर रहता है. जो पंचायत चुनाव में भी देखने को मिला था. जब तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ वोट देने पर उन्हें हिंसा का शिकार होना पीडीए था. ऐसी परिस्थिति में भाजपा बाउंड्री यानि सीमा रेखा पर बैठे हुए मतदाता को संदेश देने के लिए कि भाजपा जीत रही है आप को डरने की जरूरत नहीं है बड़े बड़े रोड शो एवं रैलियां कर रही है. ऐसे ही मतदाताओं के लिए लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने नारा दिया था चुपचाप फूल छाप यानि किसी को बताना नहीं है कि हम भाजपा के समर्थन कर रहे हैं, जो मजबूत है उसका नारा लगाते रहिये, उसकी बात करते रहे, लेकिन जब वोट देने जाएँ तो चुपचाप भाजपा को वोट दे देना.

वह मतदाता जो ममता सरकार से नाराज तो है लेकिन हिंसा के डर से अभी भी तृणमूल के साथ है. वह  तभी टूटेगा जब भाजपा एकमात्र विकल्प के रूप में जीतती हुई दिखाई देगी. एकमात्र विकल्प बनने का काम भाजपा 2019 में ही कर चुकी है.

 


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