भाजपा ने शाहनवाज हुसैन को क्यों भेजा है वापस बिहार की राजनीति में?

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य तथा पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन ने सोमवार को बिहार विधान परिषद के लिए नामांकन पत्र भर दिया| उनका निर्विरोध चुना जाना तय है तथा ऐसी पूरी संभावना है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अगले एक-दो दिन में अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करेंगे तथा शाहनवाज हुसैन भी बिहार सरकार में मंत्री के रूप में शामिल होंगे|

जब से भाजपा ने शाहनवाज हुसैन को बिहार की राजनीति में भेजा है तब से इसके राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं और इसके पीछे के कारणों को तलाशा जा रहा है|

मैंने अपने पिछले लेख में बताया था कि कैसे भाजपा ने शाहनवाज हुसैन का 6 साल का वनवास खत्म कर राजनीति की मुख्यधारा में वापसी की है| लेकिन आज हम चर्चा करेंगे शाहनवाज हुसैन के बिहार जाने से बिहार की राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव का|

सभी को मालूम है कि भाजपा बिहार में राजनीतिक परिस्थितियों को अपने नियंत्रण में चाहती है| विधानसभा चुनाव में चिराग पासवान का बखूबी उपयोग कर जनता दल यूनाइटेड को विधानसभा में 50 से कम सीटों पर समेटने के बाद, सरकार में खुद बड़ा भाई बन गई है|

यद्यपि भाजपा ने जदयू को कम सीट आने के बाद भी नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री बना दिया, लेकिन वह सरकार में अपनी अलग पहचान चाहती है| इसलिए हमेशा नीतीश कुमार के साथ चलने वाले पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को इस बार बिहार सरकार में शामिल करने की जगह उन्हें केंद्र में लाकर राज्यसभा सदस्य बना दिया गया| उनकी जगह भाजपा ने बिहार में दो उप मुख्यमंत्री बनाएं| सीमांचल से वैश्य समाज से आने वाले तारकिशोर प्रसाद तथा चंपारण से अति पिछड़ा वर्ग से आने वाली रेनू देवी को उपमुख्यमंत्री बनाया|

भाजपा ने वोट बैंक को ध्यान में रखते हुए दो-दो उपमुख्यमंत्री तो बना दिए| लेकिन इनमे से किसी का पूरे बिहार में अपनी पहचान एवं प्रभाव नहीं है| अभी बिहार सरकार में भाजपा के मंत्रियों में कोई ऐसा नहीं है जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आभामंडल से बाहर अपने प्रभाव को प्रदर्शित कर सके|

भाजपा को एक ऐसा नेता बिहार सरकार में चाहिए जिसकी पूरे बिहार में अपनी पहचान हो| जिस पर नीतीश कुमार के आभामंडल का प्रभाव ना हो| जो सरकार एवं मंत्रिमंडल में तथ्यों के साथ अपनी बात रखने के साथ-साथ दृढ़ता के साथ पार्टी का पक्ष रखें| और यदि जरूरी हो तो मुख्यमंत्री के सामने ही जिस मुद्दे पर असहमति हो असहमति जताए और आवश्यकता हो तो विरोध भी करें| यानी सरकार में  पार्टी की आवाज को पूरी ताकत एवं प्रमुखता से रखा जाए और जनता तक संदेश जाए की इस सरकार में भाजपा प्रमुख पार्टी है|

पूर्व केंद्रीय मंत्री शाहनवाज हुसैन इस ढांचा में खरे बैठते हैं| सिर्फ बिहार में ही नहीं पूरे देश में शाहनवाज हुसैन की अपनी एक पहचान है| पिछले लगभग दो दशक से समाचार चैनलों पर भाजपा का चेहरा है तथा हर कोई उनको पहचानता है|

सरकार में काम करने का भी उनके पास लंबा अनुभव है| वह भारतरत्न पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में कई मंत्रालयों जैसे खाद्य प्रसंस्करण, खेल एवं युवा मामले, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, कोयला मंत्रालय, नागरिक उड्डयन मंत्रालय तथा कपड़ा मंत्रालय जैसे विभाग संभाल चुके हैं| 52 वर्षीय शाहनवाज हुसैन को जब 2001 में वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाया गया तो केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनने वाले वह सबसे कम उम्र के व्यक्ति थे| यह रिकॉर्ड आज भी उन्हीं के पास है|

शाहनवाज हुसैन के पास नीतीश कुमार के साथ भी काम करने का अनुभव है| जब नीतीश कुमार, बाजपेयी की  सरकार में कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण मंत्री थे तो शाहनवाज हुसैन उनके राज्य मंत्री थे| तब ही अंदरखाने दोनों में कुछ खटपट भी चलती रहती है| 2019 लोकसभा चुनाव में जब शाहनवाज हुसैन का टिकट कटा और उनकी भागलपुर सीट जदयू को चली गई तो शाहनवाज ने अप्रत्यक्षरूप में इसके लिए नीतीश कुमार को भी दोषी ठहराया था|

भाजपा शाहनवाज के बहाने एक तीर से कई शिकार करना चाह रही है| सरकार में पार्टी का प्रभाव बढ़ाने एवं नीतीश कुमार का प्रभाव कम करने का काम तो होगा ही, साथ ही जदयू एवं राष्ट्रीय जनता दल के मुस्लिम प्रेम पर भी प्रहार होगा| सरकार में जब इकलौता एवं ताकतवर मुस्लिम चेहरा भाजपा का होगा तो जदयू एवं राजद को असहज स्थिति में डाले गा ही|

संक्षेप में कहें तो शाहनवाज हुसैन भाजपा के मिशन बिहार को वहां से आगे बढ़ाएंगे जहां पर चिराग पासवान ने छोड़ दिया था|

 


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