जब फोटोपत्रकार दानिश सिद्दीकी को मारा तालिबान ने तो भारत में हिंदुओं को गाली क्यों?

अफगानिस्तान (Afghanistan) में इस्लामिक आतंकवादी संगठन तालिबान (Taliban) एवं अफगानिस्तान की सेना के बीच चल रहे भीषण खूनी संघर्ष को कवर करने गए भारतीय फोटोपत्रकार दानिश सिद्दीकी ( photojournalist Danish Siddiqui) की तालिबान आतंकवादियों ने हत्या कर दी। वह एक फोटो पत्रकार थे तथा न्यूज़ एजेंसी रायटर्स के लिए काम करते थे| युद्ध एवं संघर्ष क्षेत्र में कवर करने वाले पत्रकारों को इस तरह की स्थिति का कई बार सामना करना पड़ता है|

तालिबान की इस जघन्य कृत्य की जितनी भी निंदा की जाए वह कम है| अफगानिस्तान में चल रहे खूनी संघर्ष में फोटोपत्रकार दानिश सिद्दीकी की हत्या ने यह एकबार फिर साबित कर दिया सभ्य समाज में तालिबान जैसे कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन का कोई स्थान नहीं हो सकता है| तालिबान जैसे कट्टरपंथी आतंकवादी संगठन अफगानिस्तान की सुरक्षा एवं शांति के लिए तो खतरा है ही वह विश्व शांति एवं सुरक्षा के लिए भी खतरा है| तालिबान मानवता के लिए खतरा है| तालिबान जैसे बर्बर आतंकवादी संगठन किसी की हत्या करने से पहले उसका धर्म नहीं देखते अगर वे ऐसा करते तो दानिश सिद्दीकी की हत्या नहीं करते| क्योंकि दानिश सिद्दीकी ने पत्रकार होने के बावजूद के बावजूद धार्मिक पहचान को प्रमुखता से आगे रखा जिसका उदाहरण है उनका यह ट्वीट

पत्रकार दानिश सिद्दीकी की हत्या के बाद सबकी आंखें खुल जानी चाहिए| इस्लामी कट्टरपंथ को रोकना होगा| तालिबान जैसे आतंकवादी संगठन मानव सभ्यता के लिए खतरा है और एक सुर में इसकी निंदा करनी चाहिए|

लेकिन भारत में अलग ही बखेड़ा खड़ा हो गया| जिस तालिबान ने दानिश सिद्दीकी की हत्या की उसकी की निंदा करने और लानत भेजने के बजाय भारत के कुछ पत्रकार, वामपंथी एवं तथाकथित इलिबरल एवं बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने सोशल मीडिया पर राइट विंग एवं हिंदुओं को गाली देना शुरू कर दिया|

सोशल मीडिया पर जो लोग हिंदुओं रहे उनकी हिम्मत नहीं हुई जिस तालिबान ने दानिश सिद्दीकी की हत्या की उसकी निंदा कर पाए| निंदा तो छोड़ ही दीजिए इनकी इतनी हिम्मत नहीं हुई कि अपने पोस्ट में तालिबान के नाम का जिक्र तक कर पाए|

पत्रकार रवीश कुमार ने भी दानिश सिद्दीकी की हत्या पर उनको श्रद्धांजलि अर्पित की| अपनी पोस्ट में दानिश सिद्दीकी के बारे में सब कुछ लिखा लेकिन तालिबान शब्द लिखना भूल गए| उन्होंने दानिश सिद्दीकी की हत्या के लिए उस गोली की निंदा की जिस गोली से दानिश सिद्दीकी की हत्या हुई|

कुछ तथाकथित पत्रकार एवं बुद्धिजीवी तो तालिबान का बचाव करते हुए भी नजर आए| अपने आपको समाज का ठेकेदार मानने वाले लोगों में इतनी कायरता कि जिस ने हत्या की उसका नाम तक नहीं ले पा रहे हैं? सबको पत्रकारिता का सर्टिफिकेट बांटते रहते हैं और खुद में इतनी कायरता, कि आपके एक पत्रकार साथी की हत्या हो जाती है और अंदर इतनी हिम्मत नहीं है कि जिस विचारधारा ने, जिस संगठन ने उसकी हत्या की उसका नाम तक ले पाए?

यह बात समझ से परे है की जब हत्या तालिबान ने की तो फिर ये लोग हिंदुओं को गाली क्यों देने लगे? राइट विंग इनके निशाने पर क्यों आ गया?

कुछ लोगों ने सोशल मीडिया पर दानिश सिद्दीकी के शव के फोटो को ट्वीट कर दिया| इस पर वामपंथी लोग भड़क गए और इन लोगों ने राइट विंग के लोगों को और हिंदुओं को गाली देना (निंदा करना) शुरू कर दिया। इनका कहना था कि की मृत्यु के बाद परिवार की अनुमति के बिना मृत शरीर एवं क्षत-विक्षत शव को नहीं दिखाना चाहिए, फोटो पोस्ट नहीं करना चाहिए| यह वही लोग हैं जो कोरोना की दूसरी लहर के दौरान देश में जलती चिताओं एवं परेशान मरीजों के फोटोग्राफ बढ़-चढ़कर के पोस्ट कर रहे थे तब इनको किसी से अनुमति लेने की चिंता नहीं सताई|

दानिश सिद्दीकी द्वारा खींचे गए जलती चिताओं एवं असहाय मरीजों की वे तस्वीरे विदेशी मीडिया में जमकर के प्रकाशित हुई तथा भारत में वामपंथी एवं तथाकथित लिबरल वर्ग ने उसे आगे बढ़ाया तब उन्हें उसमें कोई समस्या नजर नहीं आए|

कुछ लोगों ने दानिश सिद्दीकी की पुराने ट्वीट को रिट्वीट कर दिया| अब ऐसे समय पर ऐसी ट्वीट करने चाहिए या नहीं करना चाहिए, किसी की मृत्यु पर उसके पुराने इतिहास याद दिलाने चाहिए या नहीं दिलाने चाहिए यह अलग विषय है| लेकिन जिस तालिबान ने हत्या की उस तालिबान की निंदा करने के बजाय हिंदुओं को गाली देना समझ से परे है|

 


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