प्रखर राष्ट्रवादी और कुशल संगठनकर्ता श्यामा प्रसाद मुखर्जी

देश की अखंडता के लिए सर्वस्व समर्पित करने वाले नेता, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी Dr Shyama Prasad Mookerjee की 23 जून पुण्यतिथि है।

वे कुशल राजनीतिज्ञ, संगठनकर्ता, विद्वान और स्पष्टवादी व्यक्ति के रूप में याद किए जाते हैं। एकीकृत राष्ट्र ही उनका सर्वोच्च लक्ष्य था। वे प्रखर राष्ट्रवादी थे। इस विचारधारा से उन्होंने कभी समझौता नहीं किया। शिक्षा से लेकर महिला सशक्तिकरण और उन्नत प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उन्होंने जो कार्य किया, वह उनकी दूरदर्शिता का परिचायक था।

डॉ. मुखर्जी, विकास के लिए जनभागीदारी की महत्ता से भली-भांति परिचित थे। आइये, इन प्रेरक व्यक्तित्व की जीवन यात्रा का परिचय पाते हैं। कलकत्ता में जन्मे श्यामा प्रसाद, कम आयु में ही बने थे विश्वविद्यालय के कुलपति बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म, 6 जुलाई 1901 को कलकत्ता में हुआ था। वे बंगाली परिवार में जन्मे थे। उनके पिता का नाम आशुतोष मुखर्जी था और माता का नाम योगमाया था। सर आशुतोष मुखर्जी, बंगाल के प्रसिद्ध शिक्षाविद थे।

श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रारंभिक शिक्षा भवानीपुर स्थित मित्र इंस्टीट्यूट में हुई थी। वर्ष 1917 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की। कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से उन्होंने वर्ष 1921 में अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर की शिक्षा पूरी की। इस बीच उनका विवाह सुधा चक्रवर्ती के साथ हुआ। वर्ष 1923 में वे विश्वविद्यालय सीनेट के फेलो बने और उसी वर्ष उन्होंने बांग्ला में एम.ए. की परीक्षा, प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। इसके अगले ही वर्ष उन्होंने कलकत्ता में ही कानून की पढ़ाई की। वर्ष 1926 में बैरिस्टर बनने के लिए वे इंग्लैंड चले गए। वर्ष 1927 में वे बैरिस्टर एट लॉ की डिग्री लेकर भारत लौटे।

भारत लौटने के बाद महज 33 वर्ष की उम्र में वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति नियुक्त हुए। डॉ. मुखर्जी को विश्व के सबसे युवा कुलपति होने का सम्मान हासिल है। ऐसा रहा राजनीतिक सफर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सबसे पहले, बंगाल विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए। हालांकि किन्हीं कारण से उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। बाद में वे निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव में उतरे और दोबारा विजयी हुए। उन्हें बंगाल का वित्तमंत्री भी बनाया गया था, लेकिन एक साल से कम समय के भीतर ही,उन्होंने उस पद का त्याग कर दिया।

वर्ष 1944 में डॉ. मुखर्जी हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गए। गांधी जी की मृत्यु के बाद डॉ. मुखर्जी चाहते थे कि, हिन्दू महासभा को हिंदुओ तक ही सीमित न रखा जाए। हिंदू महासभा ने उनकी इस मांग को स्वीकार नहीं किया, इसीलिए वर्ष 1948 में वे इससे अलग हो गए। अंतरिम सरकार में वे उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री बने। वे अधिक दिनों तक इस मंत्रिमंडल का हिस्सा नहीं रहे।

डॉ. मुखर्जी ने इसके बाद संघ के साथ विचार-मंथन किया और वर्ष 1951 में भारतीय जनसंघ की स्थापना की। वर्ष 1951-52 के आम चुनाव में इसी दल से चुनाव जीतकर वे से संसद पहुंचे। डॉ. मुखर्जी भारत की अखण्डता और कश्मीर विलय के दृढ़ समर्थक थे। तत्कालीन कुख्यात परमिट कानून का उल्लंघन करते हुए उन्होंने कश्मीर में प्रवेश किया, जहां उन्हें 11 मई को गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान 23 जून 1953 को जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई।

भारत की अखंडता के प्रबल समर्थक श्यामा प्रसाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, भारत की अखंडता के प्रबल समर्थक थे। वे राष्ट्रवादी चिंतक थे और इसीलिए कश्मीर विलय के विषय पर, उस समय के नेताओं से उनका मत भिन्न था। इस मुद्दे पर वे कश्मीर को, किसी भी तरह का विशेषाधिकार देने के विरुद्ध थे। उनका मानना था कि एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो निशान नहीं हो सकते। डॉ. श्यामा प्रसाद ने कहा था कि, स्वतंत्रता के बाद भारत की एकता और अखंडता को सुनिश्चित करना सर्वाधिक आवश्यक है। जम्मू में भाषण देते हुए उन्होंने कहा था कि, ” कश्मीर को भारत का अंग बनाऊंगा या अंत तक इस उद्देश्य के लिए कार्य करते हुए बलिदान हो जाऊंगा।” बाद में उनके समर्थकों ने इसी पर नारा दिया कि, “जहां हुए बलिदान मुखर्जी वो कश्मीर हमारा है” , जो कि बेहद चर्चित रहा। कश्मीर के लिए उन्होंने सड़क से संसद तक लड़ाई लड़ी। उनका मानना था कि, भारत के भौगोलिक चित्र को इस तरह से नहीं बदला जा सकता। श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व ने जनसंघ ने कच्छ से कश्मीर तक की अखंडता का मुद्दा उठाया।

पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री ने कहा डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी का राष्ट्रवाद आधुनिक राष्ट्रवाद था। लेकिन इसके साथ ही उसमें परंपराओं की विस्मृति नहीं थी। आधुनिकता और परंपरा के समन्वय के साथ वे,नया भारत बनाना चाहते थे। उद्योग मंत्री के रूप में अपने छोटे से कार्यकाल में उन्होंने भावी भारत के औद्योगिक निर्माण की बुनियाद रखी। उनके कार्यकाल में ऑल इंडिया हैंडीक्राफ्ट बोर्ड और हैंडलूम बोर्ड की भी स्थापना की गई। राष्ट्रवादी राजनेता डॉ.श्यामाप्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर प्रधानमंत्री ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर लिखा कि – “ डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्य तिथि पर उन्हें याद करता हूं। उनके श्रेष्ठ आदर्श, समृद्ध विचार और लोगों की सेवा करने की प्रतिबद्धता हमें प्रेरित करती रहेगी। राष्ट्रीय एकता की दिशा में उनके प्रयासों को कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।” वास्तव में एकीकृत भारत के निर्माण के लिए, डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी का कार्य और उनका बलिदान, शताब्दियों तक लोगों को प्रेरित करेगा।

 


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