भारत में धर्मनिरपेक्षता एक मजाक है

भारत में धर्मनिरपेक्षता एक मजाक है। यह सर्वधर्म समभाव पर नहीं टिका है बल्कि अल्पसंख्यक विशेष रुप से मुस्लिम तुष्टिकरण पर है।

भारत में धर्मनिरपेक्षता का मतलब है बहुसंख्यक हिंदुओं को गाली देना, उन्हें नीचा दिखाना एवं उनके धार्मिक आस्थाओं का मजाक उड़ाना तथा पूरे विश्व में हिंदुओं को विलेन दिखाना।

जब भी कोई घटना होती है तो सबसे पहले पीड़ित एवं आरोपी का धर्म देखा जाता है। अगर पीड़ित मुसलमान एवं आरोपी हिंदू हो तो देश से लेकर विदेश तक की मीडिया में हिंदुओं से लेकर भारत तक को गाली देने का अभियान शुरू हो जाता है। अगर पुलिस कहती भी है कि मामला आपसी रंजिश का है तब भी उसे संप्रदायिक बताया जाता है। जमकर राजनीति होती है, बड़े-बड़े लेख लिखे जाते है और बताया जाता है कैसे मुसलमान डरा हुआ है, धर्मनिरपेक्षता खतरे में है, लोकतंत्र खतरे में है। राजनीतिक की यात्राएं होती है, बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं।

लेकिन अगर पीड़ित हिंदू और आरोपी मुसलमान हो तो उसे दबा दिया जाता है। ये बड़े बड़े धुरंधर एक ट्वीट तक नहीं करते हैं। अखबारों में उस खबर को मामूली घटना बताकर दबा दिया जाता है। इसका ताजा उदाहरण है दिल्ली के मंगोलपुरी में हुआ रिंकू शर्मा की निर्मम हत्या।

नैरेटिव गढ़ने का यह खेल हर परिस्थिति में चलता है। कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी मामले में इंदौर पुलिस ने मुनव्वर फारूकी समेत पांच लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन मीडिया ने सिर्फ फारूकी का ही नाम उछाला और उसे उल्टे पीड़ित बनाकर प्रस्तुत करने की कोशिश की।

उसी तरह मीडिया के एक वर्ग ने कश्मीर से कश्मीरी पंडितों के पलायन के लिए कश्मीरी पंडितों को ही दोषी ठहराया।

यानी हर परिस्थितियों में हिंदुओं को ही दोषी ठहराना यही है भारत की धर्मनिरपेक्षता।

ऐसे में अब हिंदू समाज को अपनी आवाज खुद उठानी होगी। अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए खुद संगठित होकर प्रतिकार करना होगा।


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