समाज में फेक न्यूज़ फैलाना मीडिया की आजादी का हिस्सा कैसे?

फेक न्यूज़ यानी फर्जी खबर एक चिंता का विषय है| विशेषकर जब परिस्थितियां बहुत ही विकट हो| उन परिस्थितियों में जब गलत खबर तथाकथित बड़े पत्रकारों द्वारा फैलाया जाता है तो मामला बहुत ही गंभीर बन जाता है|

पिछले कुछ दिनों में तथाकथित इन बड़े पत्रकारों द्वारा बिना तथ्यों को परखे गलत खबरें फैलाने का वीभत्स रूप देश ने देखा है|

सबसे पहले बिना तथ्यों को परखे नेताजी सुभाष चंद्र बोस की पोट्रेट को लेकर राष्ट्रपति भवन पर कीचड़ उछाले गए| जिसको लेकर राष्ट्रपति भवन ने सख्त विरोध दर्ज कराया है|

लेकिन 26 जनवरी को जब लाखों की भीड़ किसान ट्रैक्टर रैली के दौरान दिल्ली की सड़कों पर उत्पात मचा रही थी, तब यह गलत खबर देना कि एक प्रदर्शनकारी की पुलिस की गोली लगने से मृत्यु हो गई है, बहुत ही खतरनाक था| यह फेक न्यूज़ पहले से ही उन्मादी भीड़ को और भड़का सकता था| वह बड़े खून खराबे और दंगे का रूप ले सकता था| ऐसे विस्फोटक माहौल में गलत खबर देकर माहौल और भड़काने वालों के खिलाफ कार्यवाही होनी ही चाहिए, चाहे वह कितना भी बड़ा व्यक्ति क्यों ना हो|

पुलिस प्रशासन ने इस संबंध में राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडे एवं अन्य के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर बिल्कुल सही कदम उठाया| लेकिन इसको भी मीडिया के एक वर्ग द्वारा मीडिया की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया गया| प्रेस क्लब में जमकर के भाषण बाजी हुई| ये वही लोग थे जो महाराष्ट्र सरकार द्वारा अर्णब गोस्वामी की गिरफ्तारी पर जस्न मना रहे थे|

एक बात सबको समझ नहीं होगी अब समय बदल गया है और जनसंवाद पर किसी एक पक्ष का एकाधिपत्य खत्म हो गया है| वैसे भी मीडिया की स्वतंत्रता का अर्थ फेक न्यूज़ फैलाने की स्वतंत्रता नहीं हो सकता है|

स्वतंत्र मीडिया एवं निर्भीक पत्रकार एक लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न अंग है| इसके बिना कोई भी समाज देश या सत्ता अपने आप को लोकतांत्रिक होने का दावा नहीं कर सकता है|

एक स्वतंत्र मीडिया के अभाव में सत्ता निरंकुश हो जाती है तथा समाज अपना लोकतांत्रिक चरित्र खो देता है| इसलिए मीडिया का मजबूत होना बहुत जरूरी है| मीडिया का बड़े स्तर पर फलना फूलना बहुत जरूरी है| मीडिया का बहुआयामी होना बहुत जरूरी है| मीडिया में विविधता का होना बहुत जरूरी है ताकि किसी एक व्यक्ति, किसी एक विचार या किसी एक संस्था का उसके ऊपर एकाधिपत्य ना हो पाए|

मीडिया की स्वतंत्रता के लिए जरूरी है कि मीडिया के सभी रूप आगे बढ़े| चाहे वह टीवी हो, प्रिंट हो या डिजिटल, सबका जिंदा रहना बहुत जरूरी है| मीडिया का अधिक से अधिक विस्तार जरूरी है| कुछ मीडिया हाउसों में सिकुड़कर मीडिया स्वतंत्र नहीं रह सकती है|

मीडिया की स्वतंत्रता के लिए सबसे बड़ा खतरा है उस पर किसी एक विचार का नियंत्रण हो जाना| अबतक भारत के साथ-साथ पूरे विश्व की मीडिया पर वामपंथ का कब्जा था| लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई है| भारतीय मीडिया पर दशकों से चला आ रहा वामपंथ का एकाधिपत्य ख़त्म हो गया है| भारतीय मीडिया पर किसी एक विचार का कब्जा नहीं रहा है| वामपंथी मीडिया है तो दक्षिणपंथी भी, घोर वामपंथी है तो घोर दक्षिणपंथी भी|

अब मीडिया का विस्तार इतना बड़ा हो गया है कि दो - चार संपादक एवं मीडिया मालिक मिलकर नैरेटिव नहीं चला सकते| अब कोई सच को झूठ एवं झूठ को सच साबित नहीं कर सकता| अब जनता जानकारी के लिए किसी एक स्रोत पर आश्रित नहीं है| सच्चाई को जनता से नहीं छुपाया जा सकता|

फेक न्यूज़ मीडिया की स्वतंत्रता का हिस्सा नहीं है| मीडिया की स्वतंत्रता का मतलब है बिना डरे जनता को सच्चाई बताना ना कि फेक न्यूज़ के बहाने एक नैरेटिव गढ़ना|

 


Scroll to Top