बटुकेश्वर दत्त: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायक

भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे प्रसंग हैं, जिन्हें पढ़कर आँखें शर्म से झुक जाती हैं। इतिहास में कुछ ऐसे क्रांतिकारी हुए हैं, जिन्होनें हमें आजादी दिलाने के लिए अंग्रेजों की अमानवीय यातनाएं सहीं, लेकिन उन्हें स्वतंत्रता के बाद अपने ही लोगों की वजह से कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। कुछ ऐसा ही हुआ था सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी बटुकेश्वर दत्त (Batukeshwar Dutt ) के साथ। बटुकेश्वर दत्त को आजादी के बाद अपनी आजीविका के लिए भीषण संघर्ष करना पड़ा था। उन्होंने परिवार चलाने के लिये कभी गाइड का काम किया तो कभी कभी सिगरेट कंपनी के एजेंट बने। हद तो तब हुई जब पटना कलेक्टर ने उनसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी होने का प्रमाण पत्र मांग लिया।

मात्र 14 वर्ष की उम्र में स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े

बटुकेश्वर दत्त का जन्म 18 नवम्बर 1910 को बंगालमें हुआ था। बचपन से ही उनमें राष्ट्र और संस्कृति के लिये प्रेम था। यह भाव उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिला था। वे मात्र चौदह वर्ष के थे जब उन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने का निर्णय लिया था। उन दिनों वे क्रातिकारियों के संदेश वाहक के रूप में पर्चे बांटने का काम करते थे। जब दिल्ली विधान सभा बम कांड मामले में वह बंदी बनाए गए तब वह सबकी नजर में आए। उनका नाम लाहौर षडयंत्र केस में भी जुड़ा। बाद में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी हुई जबकि बटुकेश्वर दत्त को काला पानी की सजा मिली। फांसी की सजा न मिलने से वे दुखी और अपमानित महसूस कर रहे थे। कहा जाता है कि यह पता चलने पर भगत सिंह ने उन्हें एक चिट्ठी लिखी, जिसमें लिखा था कि वे दुनिया को यह दिखाएं कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए मर ही नहीं सकते बल्कि जीवित रहकर जेलों की अंधेरी कोठरियों में हर तरह का अत्याचार भी सहन कर सकते हैं।

कालापानी में सहीं गंभीर शारीरिक यातनाएं

उन्हें आजीवन कारावास मिला और कालापानी भेज दिया गया, जहां उन्हें गंभीर शारीरिक यातनायें दी गईं, जिससे वे मरणासन्न हो गये । अंत में अति गंभीर हालत में उन्हे 1938 में रिहा कर दिया गया । कुछ दिनों में वे स्वस्थ हो गए। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में वे फिर गिरफ्तार कर लिये गए। उन्हें चार वर्ष की सजा हुई लेकिन 1945 में ही रिहा हो गए। आजादी के बाद नवम्बर, 1947 में बटुकेश्वर दत्त ने शादी कर ली और पटना में रहने लगे, लेकिन उनकी जिंदगी का संघर्ष जारी रहा। कभी सिगरेट कंपनी एजेंट तो कभी टूरिस्ट गाइड बनकर उन्हें पटना की सड़कों की धूल छाननी पड़ी। एक बार पटना में बसों के लिए परमिट मिल रहे थे। बटुकेश्वर दत्त ने भी आवेदन किया। परमिट के लिए जब पटना के कमिश्नर के सामने पेशी हुई तो उनसे कहा गया कि वे स्वतंत्रता सेनानी होने का प्रमाण पत्र लेकर आएं। हालांकि बाद में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जब यह बात पता चली तो कमिश्नर ने बटुकेश्वर से माफी मांगी।

अपने मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में दाह संस्कार थी उनकी अंतिम इच्छा

1964 में बटुकेश्वर दत्त अचानक बीमार पड़ गए। वह पटना के सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए। इस मामले में तत्कालीन सरकार की अनदेखी पर उनके मित्र चमनलाल आजाद ने एक लेख लिखा। इस पर बिहार सरकार हरकत में आई, लेकिन तब तक उनकी हालत बिगड़ चुकी थी। 22 नवंबर 1964 को उन्हें दिल्ली लाया गया। यहां पहुंचने पर उन्होंने पत्रकारों से कहा था कि उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था जिस दिल्ली में उन्होंने बम फोड़ा था, वहीं वे एक अपाहिज की तरह स्ट्रेचर पर लाए जाएंगे। बटुकेश्वर दत्त को सफदरजंग अस्पताल में भर्ती किया गया। बाद में पता चला कि उनको कैंसर है और उनकी जिंदगी के कुछ ही दिन शेष हैं। अपने अंतिम समय में उन्होंने पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री से कहा था, “मेरी यही अंतिम इच्छा है कि मेरा दाह संस्कार मेरे मित्र भगत सिंह की समाधि के बगल में किया जाए।” उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई। 17 जुलाई को वे कोमा में चले गए और 20 जुलाई 1965 की रात उनका देहांत हो गया।

बटुकेश्वर दत्त की अंतिम इच्छा को सम्मान देते हुए उनका अंतिम संस्कार भारत-पाक सीमा के करीब हुसैनीवाला में भगत सिंह, राजगुरू और सुखदेव की समाधि के पास किया गया। आजादी के इस सिपाही ने न सिर्फ एक देशभक्त बल्कि एक सच्चे मित्र का भी फर्ज निभाया है। यह देश जितना उनका कर्जदार है, उतना ही गुनेहगार भी है। वे तो हमारे बीच नहीं रहें, लेकिन उनकी स्मृति को अपने दिलों में जिन्दा रख हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। बटुकेश्वर दत्त का त्याग और बलिदान हमेशा इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा जाएगा।

 


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